یک ظهرِ عجیب! و یک همه رفتن
(۱): یک تضمین بود از یک خاطره
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سپیده دمی که رفتن جان میگیرد و یکباره و ناگهان آن کوله ی پر کتاب را به دوش می اندازی و میروی

و غریبیِ سبز گونه هوا کم کم فرا میرسد و این سینه میترسد نفسی بکشد از برای بودن در نزدیکیِ سبزیِ خیابان های غریب


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و چه کوچه ی خاطر انگیز و سبزی و چه مدرسه ی خوبِ خوبِ خوبی(دبستان نواب صفوی)


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و چه غریب وقتی بارانی بعد از چندین ماه رویِ سرم بارید در غربتی تلخ و تنهاییِ بی سببش در نبشِ خیابانِ گلباغ...

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و یک جهان خاطره ی خوب از خیابانِ سعدیِ خوب و مسیر شهرداری به سبزه میدانِ خوبتر و آن سنگفرشِ "دوست" داشتنی و آن سینمای اول خیابان...

و چقدر این دلِ مرده میگیرد وقتی یاد میآورم آن سبز گونه خیابانِ مابینِ سبزه میدان و شهرداری را بعد از آمدنم از سینمایِ خوب و زدن به دلِ خیابان ها در تنهایی و در حوالی غروبی که به شب رسیده بود و بعد هم رفتن و کتاب خریدن (انگار این من نیستم(بیتا فرخی) و قصه های امیر علی(امیر علی نبویان) از فروشگاه جنگلِ خیابان سعدی


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و چقدر گذرا اما خوب هوای این خط های وسط خیابانِ خوب



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و بارانی که میگیرد از پشت شیشه ی غبار گرفته ی ماشین و همه اش بغض میشود پشتِ آن شیشه

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و دریای خوب که ای کاش میشد زد به دلِ آن و رفت تا بی نهایت


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و آخر هم همه چیز رنگِ تیرگی همیشه گرفت...

ای دوست